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भक्त मनिदास की कथा

भक्त मनिदास की कथा

श्रीजगन्नाथधाममें मणिदास नामके एक माली रहते थे। फूल-माला बेचकर जो कुछ मिलता था, उसमें से साधु-ब्राह्मणोंकी वे सेवा भी करते थे, दीन-दुःखियोंको, भूखोंको भी दान करते थे और अपने कुटुम्बका काम भी चलाते थे। अक्षर-ज्ञान मणिदासने नहीं पाया था; पर यह सच्ची शिक्षा उन्होंने ग्रहण कर ली थी कि दीन-दुःखी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये और दुष्कर्मोंका त्याग करके भगवान्का भजन करना चाहिये । भक्त मनिदास की कथा

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कुछ समय बाद मणिदासके स्त्री-पुत्रोंका एक-एक करके परलोकवास हो गया। जो संसारके विषयों में आसक्त, माया-मोहमें लिपटे प्राणी हैं, वे सम्पत्ति तथा परिवारका नाश होनेपर दुःखी होते हैं और भगवान्‌को दोष देते हैं; किंतु मणिदासने तो इसे भगवान्‌की कृपा मानी। उन्होंने सोचा- ‘मेरे प्रभु कितने दयामय हैं कि उन्होंने मुझे सब ओरसे बन्धनमुक्त कर दिया। मेरा मन स्त्री-पुत्रको अपना मानकर उनके मोहमें फँसा रहता था, श्रीह कृपा करके मेरे कल्याणके लिये अपनी वस्तुएँ लौटा लीं। मैं मोह-मदिरासे मतवाला होकर अपने सच्चे कर्तव्यको भूला हुआ था। अब तो जीवनका प्रत्येक क्षण प्रभुके स्मरणमें ही लगाऊँगा।’ भक्त मनिदास की कथा मणिदास अब साधुके वेशमें अपना सारा जीवन भगवान्के भजनमें ही बिताने लगे। हाथों में करताल लेकर प्रातःकाल ही स्नानादि करके वे श्रीजगन्नाथजीके सिंहद्वारपर आकर कीर्तन प्रारम्भ कर देते थे। कभीकभी प्रेममें उन्मत्त होकर नाचने लगते थे। मन्दिरके द्वार खुलनेपर भीतर जाकर श्रीजगन्नाथजीकी मूर्तिके पास. गरुड़-स्तम्भके पीछे खड़े होकर देरतक अपलक दर्शन करते रहते और फिर साष्टाङ्ग प्रणाम करके कीर्तन करने लगते थे। कीर्तनके समय मणिदासको शरीरकी सुधि भूल जाती थी। कभी नृत्य करते, कभी खड़े रह जाते। कभी गाते, स्तुति करते या रोने लगते। कभी प्रणाम करते, कभी जय-जयकार करते और कभी भूमिमें लोटने लगते थे। उनके शरीरमें अश्रु, स्वेद, कम्प, रोमाञ्च आदि आठों सात्त्विक भावोंका उदय हो जाता था। भक्त मनिदास की कथा

उस समय श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरमें मण्डपके एक भागमें नित्य पुराणकी कथा हुआ करती थी। कथावाचकजी विद्वान् तो थे, पर भगवान्‌की भक्ति उनमें नहीं थी। वे कथामें अपनी प्रतिभासे ऐसे-ऐसे भाव बतलाते थे कि श्रोता मुग्ध हो जाते थे। एक दिन कथा हो रही थी, पण्डितजी कोई अद्भुत भाव बता रहे थे कि इतनेमें करताल बजाता ‘राम-कृष्ण-गोविन्द- हरि’ की उच्च ध्वनि करता मणिदास वहाँ आ पहुँचा। मणिदास तो जगन्नाथजीके दर्शन करते ही बेसुध हो गया। उसे पता नहीं कि कहीं कौन बैठा है या क्या हो रहा है। वह तो उन्मत्त होकर नाम- ध्वनि करता हुआ नाचने लगा। कथावाचकजीको उसका यह ढंग बहुत बुरा लगा। उन्होंने डॉटकर उसे हट जानेके लिये कहा, परंतु मणिदास तो अपनी धुनमें था। उसके कान कुछ सुन नहीं रहे थे। कथावाचकजीको क्रोध आ गया। कथामें विघ्न पड़नेसे श्रोता भी उत्तेजित हो गये। मणिदासपर गालियोंके साथ-साथ थप्पड़ पड़ने लगे। जब मणिदासको बाह्यज्ञान हुआ, तब वह भाँचवका रह गया। सब बातें समझमें आनेपर उसके मनमें प्रणयकोप जागा। उसने सोचा-‘जब प्रभुके सामने ही उनकी कथा कहने तथा सुननेवाले मुझे मारते हैं, तब मैं वहाँ क्यों जाऊँ?’ जो प्रेम करता है, उसीको रूठनेका भी अधिकार है। भक्त मनिदास की कथा

मणिदास आज श्रीजगन्नाथजीसे रूठकर भूखा-प्यासा एक मठमें दिनभर पड़ा रहा। मन्दिरमें सन्ध्या आरती हुई, पट बंद हो गये, पर मणिदास आया नहीं। रात्रिको द्वार बंद हो गये। • पुरी-नरेशने उसी रात्रि में स्वप्नमें श्रीजगनाथजीके दर्शन किये। प्रभु कह रहे थे- ‘तू कैसा राजा है। मेरे मन्दिरमें क्या होता है, तुझे इसकी भी खबर नहीं रहती। मेरा भक्त मणिदास नित्य मन्दिरमे करताल बजाकर किया करता है। तेरे कथावाचकने उसे आज भारका मन्दिरसे निकाल दिया। उसका कीर्तन सुने बिना सब फीका जान पड़ता है। मेरा मणिदास आज म -प्यासा पड़ा है। तू स्वयं जाकर उसे सन्तुष्ट कर। भक्त मनिदास की कथा

अबसे उसके कीर्तनमें कोई विघ्न नहीं होना चाहिये । कोई कथावाचक आजसे मेरे मन्दिरमें कथा नहीं करेगा। मेरा मन्दिर तो मेरे भक्तोंके कीर्तन करनेके लिये सुरक्षित रहेगा। कथा अब लक्ष्मीजीके मन्दिरमें होगी।’ काउधर मठमें पड़े मणिदासने देखा कि सहसा कोटिकोटि सूर्योके समान शीतल प्रकाश चारों ओर फैल गया है। स्वयं जगन्नाथजी प्रकट होकर उसके सिरपर हाथ रखकर कह रहे हैं—’बेटा मणिदास! तू भूखा क्यों है। देख तेरे भूखे रहनेसे मैंने भी आज उपवास किया है। उठ, तू जल्दी भोजन तो कर ले!’ भगवान् अन्तर्धान हो गये। मणिदासने देखा कि महाप्रसादका थाल सामने रखा है। उसका प्रणयरोष दूर हो गया। प्रसाद पाया उसने । उधर राजाकी निद्रा टूटी। घोड़ेपर सवार होकर वह स्वयं जाँच करने मन्दिर पहुँचा। पता लगाकर मठमें मणिदासके पास गया। मणिदासमें अभिमान तो था नहीं, वह राजी हो गया। राजाने उसका सत्कार किया। करताल लेकर मणिदास स्तुति करता हुआ श्रीजगन्नाथजीके सम्मुख नृत्य करने लगा। उसी दिनसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें कथाका बाँचना बंद हो गया। कथा अबतक श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके नैऋत्य कोणमें स्थित श्रीलक्ष्मीजीके मन्दिरमें होती है मणिदास जीवनभर वहीं कीर्तन करते रहे। अन्तमें श्रीजगन्नाथजीकी सेवाके लिये व उनके दिव्यधाम पधारे।

भक्त मनिदास की कथा 1 कवि गंग के दोहे 2 कवि वृन्द के दोहे 3 रहीम के दोहे 4 राजिया के सौरठे 5 सतसंग महिमा के दोहे 6 कबीर दास जी की दोहे 7 कबीर साहेब के दोहे 8 विक्रम बैताल के दोहे 9 विद्याध्यायन के दोह 10 सगरामदास जी कि कुंडलियां 11 गुर, महिमा के दोहे 12 मंगलगिरी जी की कुंडलियाँ 13 धर्म क्या है ? दोहे 14 उलट बोध के दोहे 15 काफिर बोध के दोहे 16 रसखान के दोहे 17 गोकुल गाँव को पेंडोही न्यारौ 18 गिरधर कविराय की कुंडलियाँ 19 चौबीस सिद्धियां के दोहे 20 तुलसीदास जी के दोहे यूट्यूब चैनल पर सुनने के लिए कवि गंग के दोहे सुनने के लिए👉 (click here) गिरधर की कुंडलियाँ सुनने के लिए👉 (click here) धर्म क्या है ? सुनने के लिए👉 (click here)

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My name is Sonu Patel i am from india i like write on spritual topic

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